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ओबामा की दक्षिण एशिया नीति और उसका आनेवाला परिणाम

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ओबामा की दक्षिण एशिया नीति और उसके आनेवाला परिणाम डॉ. रिचर्ड बेंकिन
अमेरिकी पत्रकार

बहुत से रुढिवादी अमेरिकावासी बराक ओबामा का देश के 44 वे राष्ट्रपति चुने जाने पर चिंतित रहते है, वजह ओबामा की नीतियो मे परिपक्वता का अभाव।जिस हलके मे सबसे अधिक चिंता जताई जा रही है वह है विदेश नीति जिसके बारे मे ओबामा की जानकारी न के बराबर और यही रुढिवादियो को चिंतित करती है।जिस तरह ओबामा वैदेशिक मामलो पर विचार व्यक्त कर रहे है उससे इस्लामिक आतंकवादी और उसके समर्थक खुश हो रहे है। पद सम्भालने से पहले ही ओबामा के विदेश नीतियो को कसौटी पर कसा जाने लगा है।

 मुम्बई मे आतंकवादी हमलो के बाद ओबामा को फोन करके अनुरोध किया जाने लगा कि दक्षिण एशिया क्षेत्रीय समस्या का हल खोजने का प्रयास करे। हमला होने से पहले ही ओबामा ने फैसला कर लिया था कि इस समस्या का समाधान खोजना है। इसी वजह से वाशिंगटन पोस्ट को दिए साक्षात्कार मे ओबामा का कहना था कि अफगानिस्तान की समस्या को हल करने के लिए क्षेत्रीय रणनीति बनाने की जरुरत है। बीबीसी के अनुसार ओबामा अफगानिस्तान समस्या को पाकिस्तान, भारत और ईरान से मिलाकर देखते है।

अमेरिका मे अफवाहो का बाजार गर्म है कि अमेरिका के पूर्व राजनयिक रिचर्ड हालब्रुक को दक्षिण एशिया का अपना विशेष दूत बनायेंगे, लेकिन अभी इसकी पुष्टि नही हो पायी है। सूत्रो से जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार हालब्रुक की नियुक्ति और ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह साथ साथ होने की सम्भावना है। हाल ही मे विदेश मामले पर लिखे एक आलेख जिसमे दक्षिण एशिया क्षेत्रीय रणनीति के मामले मे अपने विचार प्रकट किये है। ब्रुक की रणनीति मे अफगानिस्तान के अलावा ईरान ,चीन, रुस पाकिस्तान, और भारत शामिल है। ब्रुक कारजाई को एक कमजोर राष्ट्रपति मानते है,साथ ही साथ उनका यह भी मानना है कि अफगानिस्तान को मदद करने से पूर्व अमेरिका को कठोर शर्त्त लगाना चाहिए। अगर अफगानिस्तान य मानने से इनकार करता है तो मदद रोक देनी चाहिए। यदि ओबामा अफगानिस्तान की समस्या के साथ भारत और पाकिस्तान को भी सात जोडकर देखता है तो इसका परिणाम विनाशकारी होगा। इसलिए इस रणनीति का दक्षिण एशिया के जानकार विरोध कर रहे है।

अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ अश्ले ज़े टेलीस जो एशिया मामले के जानकार भी है ने बीबीसी को बताया कि वे ओबामा और हालब्रुक के विचारो से सहमत नही है। यह मुम्बई हमले से पहले भी बुरा विचार था और मुम्बई हमलो के बाद भी बुरा विचार है। जितना जल्दी इस विचार से हम अलग होंगे उतना ही जल्दी अमेरिका के लिए ही नही पूरे दक्षिण एशिया के लिए बेहत्तर साबित होगा।अश्ले का आगे कहना था कि समस्या की आधी वजह कमजोर पाकिस्तान है जो अपनी राष्ट्रीय सीमाओ को नियंत्रित नही कर पा रहा है और आधी उसके अन्दर काम कर रहे आतंकवादी संगठन जो उसको और विश्व विरादरी को चुनौती दे रहे है। ओबामा की सरकार को इसका सीधा सामना करना पडेगा। ओबामा खुद इस मामले पर साफ नही है कि उनको क्या करना है कभी मुसलमानो से बातचीत की बात करते है तो कभी दक्षिण एशिया की समस्या के सामाधान की बात करते है। फैसला उनको करना है कि वे क्या चाह्ते है।

लेकिन मध्य पूर्व शांति वार्त्ता को देखे तो अमेरिका का इतिहास कोई खास बेहतर नही है। इसे 2000 मे क्लिंटन की असफलता कहे या जार्ज बुश की दोनो मे से कोई शांति वार्त्ता की गाडी को आगे बढाने मे नकामयाब रहे, वजह जो भी रहा हो। इतना दो मानना ही पडेगा की समस्या की गहराई तक जानकारी दोनो मे किसी के पास नही थी इसलिए असफलता हाथ लगी। अगर यही पैमाना दक्षिण एशिया पर लागू किया जाये तो क्या हो सकता है। पहले तो यह पता लगाना होगा की वार्त्ता किन किन देशो के बीच करानी है तो प्रश्न उठेगा कि मध्यस्था कौन करेगा फिर स्थल की भी बात उठेगी?

अगर मान भी लिया जाय की समस्या को अलग करके हल करने का प्रयास किया जाय तो सफलता मिलने की सम्भावना बढ सकती है। उदाहरण स्वरुप कश्मीर समस्या को ही ले भारत और पाकिस्तान अपने अपने दावे कर रहे तो कश्मीरि अलग राष्ट्र की मांग कर रहे है, उस कश्मीर का जिक्र नही हो रहा है जो चीन के नियंत्रण मे है। कोई भी कल्पना कर सकता है कि क्या होगा? चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपनी दावेदारी जता रहा है, जिसका भारत विरोध कर रहा है? क्या ओबामा को यकीन है कि ये पैचीदा गुत्थी को सुलझा पायेंगे?

अगर यह मान भी लिया जाये कि सुखद भविष्य की कामना करते हुए वार्त्ता के लिए तैयार भी हो जाए तो विवादस्पद मुद्दो के समाधान के लिए जो बातचीत होगी उसमे एक तरफ इस्लामिक चरमपंथी के प्रतिनिधि होंगे और दूसरी तरफ सामाजिक लोकतन्त्र मे विश्वास करने वाले होंगे। हिन्दू और मुस्लिम होंगे जो एक दूसरे का विरोध करते है। क्या हम कश्मीर मे इस्लामिक आतंकवादियो की बात मानने के लिए बांग्लादेशी हिन्दुओ की बलि चढा देंगे? यदि इस्लामिक आतंकवादी की बात मानकर सीमा को अफगानिस्तान तक बढाते है तो हमे बदले मे क्या मिलेगा? हर खबरो मे इस बात की पुष्टि हुई है कि मुम्बई हमलावर के तार बांग्लादेश और पाकिस्तान से जुड्ते है। इसका क्या हल निकलेगा कश्मीर समस्या इन से भी जुडा है। यदि अमेरिका यहूदी और मुसलमानो को जेरुसलम के बारे मे राजी नही कर पाया तो क्या वह् राम मन्दिर मामले पर हिन्दू और मुस्लिम से अच्छे परिणाम की उम्मीद करता है।

यह भी मानना चाहिए कि दोनो समस्याओ के विरोध करने वाले लोग भी अपने विचारो पर कायम रहने वाले है। उदाहरण स्वरुप हमास ने यह घोषणा कर रखी है वह ऐसे किसी भी मध्य पूर्व शांति वार्त्ता के परिणामो को स्वीकार नही करेगा जो इजरायल को एक देश के रुप मे मान्यता देती है। ठीक उसी तरह कौन तालिबान को कहेगा कि अफगानिस्तान हुए शांति समझौते का पालन करे? कौन इस बात को सुनिश्चित करेगा कि लश्कर ए तैयबा कश्मीर समझौता का सम्मान करे? पाक तो ऐसा कहने से रहा ऐसे मे भारत बचता है कि इस तरह के समझौते को माने। यानि संघर्ष घटने के बजाय बढेगा। मध्य पूर्व शांति वार्ता का विफल होने की यही प्रमुख वजह है। यानि अरब आतंकवादियो को पनपने मे मदद करता है और यह चाहता है कि इजरायल शांति वार्त्ता का सम्मान करे क्या यह सम्भव है?  

मध्यपूर्व और दक्षिण एशिया संघर्ष की पीछे लोकतांत्रिक समाज है जो समस्या का शांति पूर्वक हल चाह्ता है। इसलिए बातचीत के लिए भी हरदम तैयार रहता है। दूसरा पक्ष हमेशा ही समस्या को उलझा कर रखना चाह्ता है, उसे समाधान मे नही संघर्ष मे विश्वास करता है इसलिए समस्या सुलझने के बजाय उझलती चली जा रही है। अंत मे यही कहा जा सकता है कि दक्षिण एशिया के समस्या का समाधान चाहने वाला तीसरा पक्ष चाहे (अमेरिका, यूरोपियन युनियन या यूएनओ) जो  हो उसे पहले रुढिवादी इस्लामिक तत्त्वो पर विजय प्राप्त करनी होगी तब जाकर क्षेत्रीय समस्याओ का हल हो पायेगा,अन्यथा नही।  


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